Saturday, November 3, 2012

Ped woh aur panchi

पहले वह पेड़ घना था
उन्होने टहनिया काट दी हैं 
और अब यहाँ सर्दियों का मौसम है 

(यहाँ वह मैं हूँ)

वह अब अपनी खिडकी से देखता है 
उस पेड़ को जो घना था पर 
लकिन अब उसके हाथ काट दिये गए है 
अब वह देखता है अपने हाथों को 
फिर देखता है उस पेड़ को
असहाय ठंड में ठिठुरता हुआ

कुछ समय पहले यहाँ गरम हवाए थी
यही टहनिया ठिकाना थी उन पत्तियों का
जिनकी छाव ने मुसाफिरों को राहत दी
बसेरा बनी उन पछियो का जिनका ठिकाना न था
कहीं नहीं है दोनों
ना तोह पछी ना ही वोह मुसाफिर
कुछ चेहरे है जाने पहचाने
जो रहते थे पूरी दोपहर इसकी छाया में
कहते थे यही उनका सहारा है

लकिन अब वही दोस्त
टहनियाँ काट के ले जा रहे है अपने घरों में
क्योंकि सर्दियों का मौसम है
छोड़ कर सहारे को असहाय
ठण्ड में ठिठुरने के लिए

वह खिड़की के उस पार असहाय सोच सकता है
कि काश उसके अपने हाथ
पछी बन सकते और उड़ सकते
पर वोह भी नहीं जानता
ये पछी उड़ेंगे तोह अपना अगला घर कहा बनायेंगे।

1 comment :

  1. i read it when it was being written .. and i just wish i could read it in your mind as you types this.. lovely :)

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